शहडोल। जिले में कोयला परिवहन व्यवस्था से जुड़ा एक मामला गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। रामपुर बुढ़ार खदान से राजस्थान के उदयपुर के लिए रवाना हुए कोयले से लदे ट्रेलर के निर्धारित गंतव्य तक नहीं पहुँचने की शिकायत सामने आई है। शिकायतकर्ता नितिन कुमार शर्मा के अनुसार, ट्रेलर क्रमांक HR 63 E 1833 में 43.490 मीट्रिक टन कोयला लोड था, जिसका अनुमानित मूल्य लगभग 4 लाख 25 हजार रुपये बताया गया है। इसके साथ 93 हजार रुपये की एडवांस राशि का भी उल्लेख शिकायत में किया गया है।
इस पूरे मामले में साक्षी इंटरप्राइजेज, उदयपुर (राजस्थान) का नाम परिवहन संबंधी दस्तावेजों में सामने आने की बात कही गई है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कोयले की उक्त खेप का वास्तविक गंतव्य क्या था, माल कि डिलीवरी किसे होनी थी और यदि वाहन निर्धारित स्थान तक नहीं पहुँचा, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है? इन सवालों का जवाब संबंधित दस्तावेजों और निष्पक्ष जाँच से ही सामने आ सकता है।
10 सितंबर को रवाना हुआ ट्रेलर, फिर कहाँ पहुँचा कोयला?
शिकायत में उल्लेख है कि वाहन 10 सितंबर 2026 को रामपुर बुढ़ार खदान से उदयपुर, राजस्थान के लिए रवाना हुआ था। वाहन में 43.490 मीट्रिक टन कोयला लोड होने की जानकारी दी गई है। शिकायतकर्ता का कहना है कि वाहन निर्धारित गंतव्य तक नहीं पहुँचा और संबंधित लोगों से संपर्क करने में भी परेशानी हुई।
यदि शिकायत में बताए गए तथ्य दस्तावेजों से प्रमाणित होते हैं, तो यह मामला केवल एक वाहन की आवाजाही का नहीं, बल्कि कोयले की खेप, परिवहन अनुबंध, माल की सुपुर्दगी और आर्थिक जवाबदेही का भी बन सकता है। वाहन की जीपीएस लोकेशन, टोल प्लाजा रिकॉर्ड, खदान से निकासी की पर्ची, ई-वे बिल और प्राप्तकर्ता के रिकॉर्ड की जाँच से मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
साक्षी इंटरप्राइजेज के नाम पर उठे सवाल, कंपनी का पक्ष भी जरूरी
इस प्रकरण में साक्षी इंटरप्राइजेज, उदयपुर का नाम शिकायतकर्ता द्वारा बताए गए दस्तावेजों में दर्ज होने के कारण चर्चा में है। हालांकि, केवल दस्तावेज में नाम आने से कंपनी या उसके किसी अधिकारी की संलिप्तता सिद्ध नहीं होती। यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि कंपनी की भूमिका क्या थी, माल किसके आदेश पर भेजा गया, डिलीवरी किसे मिलनी थी और परिवहन की जिम्मेदारी किस पक्ष के पास थी।
कंपनी का आधिकारिक पक्ष, संबंधित परिवहनकर्ता का जवाब तथा खदान और प्राप्तकर्ता के रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही किसी की जवाबदेही तय की जा सकती है। ऐसे में संबंधित कंपनी और परिवहन से जुड़े पक्षों का स्पष्टीकरण लेना भी आवश्यक है।
थाना अमलाई में शिकायत, फिर एसपी कार्यालय पहुँचा मामला
शिकायतकर्ता नितिन कुमार शर्मा के अनुसार, उन्होंने 17 सितंबर 2026 को थाना अमलाई में लिखित आवेदन दिया था। इसके बाद 29 सितंबर 2026 को पुलिस अधीक्षक, शहडोल के समक्ष भी शिकायत प्रस्तुत की गई। शिकायत की प्रति पर प्राप्ति संबंधी मुहर दिखाई देती है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि आवेदन देने के बाद भी उन्हें मामले में की गई कार्रवाई के संबंध में संतोषजनक जानकारी नहीं मिली। हालाँकि, पुलिस ने वास्तव में क्या जाँच की है, कोई प्राथमिकी दर्ज हुई है या नहीं तथा संबंधित अधिकारियों ने क्या कदम उठाए हैं, इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
₹4.25 लाख का कोयला और ₹93 हजार की एडवांस राशि—हिसाब कौन देगा?
शिकायत में कोयले का अनुमानित मूल्य 4 लाख 25 हजार रुपये और एडवांस राशि 93 हजार रुपये बताई गई है। इन दोनों राशियों का आपस में क्या संबंध है, भुगतान किसने किया और वास्तविक आर्थिक नुकसान किस पक्ष को हुआ—इन बिंदुओं पर स्पष्टता जरूरी है।
यदि माल की डिलीवरी नहीं हुई है, तो परिवहन संबंधी दस्तावेज, भुगतान रिकॉर्ड और अनुबंध के आधार पर जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए। यदि जाँच में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात या किसी अन्य अपराध के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
जाँच के घेरे में प्रमुख सवाल
क्या ट्रेलर वास्तव में उदयपुर के लिए रवाना हुआ था और उसका अंतिम लोकेशन रिकॉर्ड क्या है?
43.490 मीट्रिक टन कोयले की निकासी, तौल और डिलीवरी के दस्तावेज क्या कहते हैं?
साक्षी इंटरप्राइजेज की इस खेप में वास्तविक भूमिका क्या थी?
वाहन मालिक, चालक, परिवहनकर्ता और माल प्राप्तकर्ता की जिम्मेदारियाँ क्या थीं?
थाना अमलाई और पुलिस अधीक्षक कार्यालय में प्रस्तुत शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
कोयले की खेप की वर्तमान स्थिति क्या है और कथित आर्थिक नुकसान की जवाबदेही किसकी बनती है?
पुलिस प्रशासन से निष्पक्ष जाँच की अपेक्षा
कोयला परिवहन से जुड़े इस मामले में शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जाँच आवश्यक है। संबंधित वाहन की आवाजाही, कोयले की निकासी और डिलीवरी, भुगतान के रिकॉर्ड तथा सभी पक्षों के बयान जाँच का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।
जिले के पुलिस प्रशासन से अपेक्षा है कि शिकायत पर हुई कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट की जाए और यदि किसी संज्ञेय अपराध के तथ्य सामने आते हैं, तो कानून के अनुसार उचित कदम उठाए जाएँ। साथ ही, संबंधित कंपनी और परिवहन से जुड़े पक्षों का पक्ष भी सामने आना चाहिए, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो और किसी निर्दोष व्यक्ति या संस्था पर निराधार आरोप न लगे।
अब निगाहें पुलिस जाँच पर हैं—क्या कोयले की खेप का पता चलेगा, आर्थिक लेन-देन की सच्चाई सामने आएगी और जिम्मेदार पक्षों की जवाबदेही तय होगी? इन सवालों के जवाब संबंधित दस्तावेजों और निष्पक्ष जाँच से ही मिल सकेंगे।