अनूपपुर। एसईसीएल (SECL) के सोहागपुर क्षेत्र अंतर्गत संचालित बटुरा रामपुर मेगा प्रोजेक्ट में भू-विस्थापित किसानों को मुआवजा तो मिल गया, लेकिन पुनर्वास नीति के तहत मिलने वाले न्यायसंगत रोजगार के लिए उन्हें अब भी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। रोजगार के इंतजार में महीनों से परेशान किसान अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। उनका आरोप है कि प्रबंधन की कागजी प्रक्रिया के चलते रोजगार का मामला जानबूझकर लंबा खींचा जा रहा है, जबकि प्रभावित परिवार अपने अधिकार के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं।

ग्राम रामपुर के प्रभावित खातेदार महादेव कहार, हेतराम साहू, रमाकांत मिश्रा और धनीराम कहार की रोजगार फाइलें लंबे समय से लंबित होने का मामला सामने आया है। किसानों का कहना है कि उन्होंने अपनी ओर से आवश्यक दस्तावेज जमा कर दिए हैं, इसके बावजूद रोजगार आदेश जारी नहीं किए जा रहे हैं। इससे प्रभावित परिवारों के सामने आर्थिक संकट के साथ भविष्य की चिंता भी खड़ी हो गई है।
दस्तावेज जमा, फिर भी रोजगार के लिए भटक रहे किसान

मामले में किसानों की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों और प्रबंधन के आधिकारिक पत्रों के आधार पर रोजगार प्रक्रिया में देरी पर सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रबंधन के पत्र क्रमांक SECL/SGP/SAM/BATURA/2026/1220 में रोजगार फाइलों की जांच के बाद कई आपत्तियां दर्ज किए जाने का उल्लेख है। इनमें खसरा-खतौनी संलग्न करने, पूर्व में न्यायालय तहसीलदार बदरा द्वारा जारी बंटवारा आदेशों के रिकॉर्ड का सत्यापन कराने तथा संबंधित अभिलेखों का परीक्षण करने जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।

किसानों का आरोप है कि हर बार नई कागजी औपचारिकता सामने आने से उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है। उनका कहना है कि यदि किसी दस्तावेज में कमी थी, तो इसकी जानकारी समय पर देकर समाधान कराया जाना चाहिए था, न कि उन्हें महीनों तक कार्यालयों के चक्कर लगवाए जाते।
नाम भिन्नता के लिए शपथ पत्र भी, फिर भी नहीं निकला रास्ता
प्रभावित किसानों की ओर से नाम की मामूली भिन्नता को लेकर भी दस्तावेज तैयार कराए गए हैं। चंद्रिका प्रसाद वर्मा के पुत्र अंकुर कुमार वर्मा और चंद्रिका प्रकाश वर्मा ने नाम संबंधी अंतर के सत्यापन के लिए शपथ पत्र क्रमांक 2580/2026 एवं 2618/2026 तैयार कराए हैं। किसानों का कहना है कि शैक्षणिक दस्तावेज, आधार कार्ड और वोटर आईडी में नाम की मामूली भिन्नता के बावजूद संबंधित व्यक्ति की पहचान स्पष्ट है।
इसके बावजूद प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाने से प्रभावित परिवारों में नाराजगी बढ़ रही है। किसानों का कहना है कि दस्तावेजों के सत्यापन और रोजगार संबंधी निर्णय के लिए एक स्पष्ट समयसीमा तय होनी चाहिए, ताकि विस्थापित परिवार अनिश्चितता में न रहें।
35 लाख के एग्रीमेंट पर भी उठे सवाल
मामले में किसानों ने जमीन पर काम शुरू कराने और रोजगार देने की प्रक्रिया के बीच कथित विसंगतियों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि प्रभावित जमीन पर करीब 35 लाख रुपए का एग्रीमेंट होने के बावजूद रोजगार का मामला लंबित है। किसानों के अनुसार, पूर्व में संबंधित जमीन पर जेसीबी लगाकर काम शुरू कराया गया था और प्रबंधन की ओर से दो महीने के भीतर रोजगार देने का आश्वासन दिया गया था। लेकिन निर्धारित समय बीतने के बाद भी उन्हें नियुक्ति नहीं मिल सकी।
किसानों का कहना है कि यदि जमीन परियोजना के काम में उपयोग की जा रही है, तो प्रभावित परिवारों के रोजगार संबंधी प्रकरणों का भी नियमानुसार और समयबद्ध निराकरण होना चाहिए।
बदलते बयानों से बढ़ा असंतोष
प्रभावित किसान रमाकांत मिश्रा का कहना है कि जब भी वे रोजगार के संबंध में प्रबंधन के पास जाते हैं, उन्हें नई कागजी आपत्तियों का सामना करना पड़ता है। उनका आरोप है कि कभी किसी दस्तावेज की कमी बताई जाती है, तो कभी दूसरे रिकॉर्ड के सत्यापन की बात कहकर मामला टाल दिया जाता है। इससे परिवारों को आर्थिक परेशानियों के साथ मानसिक तनाव भी झेलना पड़ रहा है।
किसानों ने स्पष्ट किया है कि वे नियमों के तहत आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने को तैयार हैं, लेकिन प्रक्रिया के नाम पर अनिश्चितकाल तक इंतजार नहीं कर सकते। उनकी मांग है कि सभी लंबित प्रकरणों की एक साथ समीक्षा कर आपत्तियों का निराकरण किया जाए और पात्र प्रभावितों को रोजगार आदेश जारी किए जाएं।
रोजगार आदेश तक काम बंद रखने की चेतावनी
लगातार हो रही देरी से नाराज किसानों ने चेतावनी दी है कि जब तक पात्र भू-विस्थापितों को रोजगार संबंधी आदेश जारी नहीं किए जाते, तब तक वे मेगा प्रोजेक्ट के काम को आगे नहीं बढ़ने देंगे। उनका कहना है कि जमीन अधिग्रहण और परियोजना संचालन के साथ प्रभावित परिवारों के पुनर्वास तथा रोजगार के अधिकारों को भी समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
अब सवाल यह है कि जब प्रभावित किसान दस्तावेजों के साथ लगातार अपना पक्ष रख रहे हैं, तो रोजगार संबंधी प्रकरणों का निराकरण आखिर कब होगा? क्या एसईसीएल प्रबंधन इन मामलों में समयसीमा तय कर किसानों को राहत देगा या रोजगार की आस में प्रभावित परिवारों को इसी तरह दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे?
लेखक
NewsDose