मुकेश पटेल 9644544570
शहडोल। जिले में आदिवासियों की जमीन के संरक्षण को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। सोहागपुर तहसील क्षेत्र में आदिवासी भूमि पर किआ कंपनी का शोरूम खड़ा किए जाने के मामले में एसडीएम कोर्ट ने माना है कि संबंधित भूमि का हस्तांतरण नियमों के विपरीत और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किया गया। मामले में मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता 1959 की धाराओं का उल्लंघन भी सामने आया है।
मामला सोहन बैगा पिता स्व. भोला बैगा निवासी ग्राम पड़री तहसील सोहागपुर और राजेश गुप्ता पिता दयानिधान गुप्ता से संबंधित है। आवेदक ने न्यायालय में शिकायत करते हुए बताया कि उसकी पुश्तैनी जमीन खसरा नंबर 193 में 0.858 हेक्टेयर तथा खसरा नंबर 183/482 में 0.154 हेक्टेयर भूमि थी। आरोप है कि वर्ष 1958-59 के राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज भूमि को बाद में राजेश गुप्ता के नाम फर्जी तरीके से दर्ज करा दिया गया।
जांच में आदिवासी भूमि का हस्तांतरण नियम विरुद्ध मिला
मामले की जांच राजस्व निरीक्षक मंडल सोहागपुर एवं तहसीलदार सोहागपुर द्वारा की गई। जांच रिपोर्ट में सामने आया कि संबंधित भूमि के पुराने राजस्व रिकॉर्ड में आदिवासी बैगा समाज के लोगों के नाम दर्ज थे। न्यायालय ने माना कि सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना आदिवासी की जमीन का हस्तांतरण किया जाना मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 165(6) एवं 170(ख) के प्रावधानों का उल्लंघन है।
कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड में वर्ष 1958-59 के खसरा रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया गया। इसमें खसरा नंबर 83 में काशी पिता विश्वनाथ टोमर सहित अन्य आदिवासी बैगा समाज के लोगों के नाम दर्ज होना पाया गया। इसके बाद जमीन के हस्तांतरण से जुड़े दस्तावेजों की जांच में बिक्री व रजिस्ट्री को लेकर गंभीर आपत्तियां सामने आईं।
1980 की रजिस्ट्री और बाद के दस्तावेजों पर भी सवाल
मामले में रजिस्ट्री विक्रय पत्र क्रमांक 1301 दिनांक 12 जनवरी 1980 का उल्लेख है। इसके बाद वर्ष 2005 में शारद कुमार सुहाने के नाम किए गए विक्रय से संबंधित दस्तावेजों को भी न्यायालय के समक्ष रखा गया। कोर्ट ने संबंधित दस्तावेजों को कूट रचित एवं फर्जी दस्तावेजों के आधार पर तैयार किए जाने की बात मानी।
जांच में यह भी सामने आया कि पुराने खसरा नंबर और वर्तमान खसरा नंबर में परिवर्तन हुआ है। रिकॉर्ड के अनुसार खसरा नंबर 83/1 का नया खसरा नंबर 193 दर्ज हुआ। करीब 2.12 एकड़ भूमि में पुराने रिकॉर्ड में काशी पिता विश्वनाथ टोमर के नाम केवल 0.38 एकड़ भूमि दर्ज थी, जबकि शेष करीब 1.74 एकड़ भूमि को लेकर आदिवासी वारिसों के अधिकार का मामला सामने आया।
आदिवासी वारिसों के नाम दर्ज करने के निर्देश
एसडीएम सोहागपुर ने मामले में तहसीलदार को निर्देशित किया कि आदिवासी वर्ग के वैधानिक वारिसों के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए जाएं और उन्हें भूमि पर कब्जा दिलाने की कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदिवासी की पुश्तैनी जमीन को नियमों के विपरीत हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।
खास बात यह है कि जिस जमीन को लेकर विवाद सामने आया है, उसी क्षेत्र में अब किआ कंपनी का शोरूम संचालित है। इससे प्रशासनिक स्तर पर भूमि हस्तांतरण और दस्तावेजों की जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब सवाल यह है कि जब आदिवासी भूमि के हस्तांतरण पर कानून में स्पष्ट रोक और सक्षम अधिकारी की अनुमति की अनिवार्यता है, तो आखिर यह जमीन निजी हाथों में कैसे पहुंची और उस पर व्यावसायिक निर्माण कैसे खड़ा हो गया? मामला सामने आने के बाद प्रशासन द्वारा दस्तावेजों की दोबारा जांच और आगे की कार्रवाई की बात कही गई है।
लेखक
NewsDose